Sandhya Kathaसंध्या कथा

राम ने कहा—अब बैर समाप्त

विभीषण उसी भाई के लिए रोए जिसका साथ छोड़ दिया था। राम ने कहा कि उसके अंतिम संस्कार होने चाहिए।

प्रकाशक Sandhya Katha · अद्यतन

समीक्षित हिन्दी संस्करण

इसे माता-पिता के पढ़कर सुनाने, हिन्दी भाषा-संपादन और मूल स्रोत से मिलान—तीनों के बाद मंज़ूर किया गया है। भाषा बदलने से कहानी की पहचान नहीं बदलती।

रामायण

मूल स्रोत का मूल रूप

Vālmīki Rāmāyaṇa — Yuddha Kāṇḍa, received-text sargas 109 and 111

परंपरा के बारे में. चुने हुए अध्यायों में राम अंतिम संस्कार का निर्देश दो बार देते हैं। पहली बार विभीषण अनुमति माँगते हैं; बाद में अपराधों के कारण हिचकिचाते हैं। अंत में राम का क्रोध छोड़ना आता है; सबको हर परिस्थिति में क्षमा करने का आदेश यहाँ नहीं बनाया गया है।

शुरू करने से पहले. युद्ध में भाई की मृत्यु, शोक और अंतिम संस्कार आते हैं। शरीर या अग्नि का भयानक वर्णन नहीं है। सम्मान देना अपराध को सही मानना नहीं है।

6 मिनटउम्र 9+मृत्यु, हिंसामूल कहानी v1
राम ने कहा—अब बैर समाप्त
समीक्षित चित्र · मूल कहानी v1
पूरी कहानी · 6 मिनट

लंका का युद्ध समाप्त हो चुका था।

रावण युद्धभूमि में पड़ा था। उसका चमकता मुकुट सिर से उतरकर धरती पर गिर गया था। उसकी विशाल भुजाएँ अब बिल्कुल शांत थीं।

वही रावण, जिसकी शक्ति से तीनों लोक भय खाते थे। वही रावण, जिसने अनेक बड़े योद्धाओं को पराजित किया था।

आज राम के हाथों युद्ध में मारा गया था।

उसके छोटे भाई विभीषण उसके पास आए।

विभीषण ने रावण को पहले कितनी ही बार समझाया था।

सीता को लौटा दो। राम से शत्रुता मत बढ़ाओ।

लेकिन रावण ने उनकी बात नहीं मानी।

अंत में विभीषण ने लंका छोड़ दी और राम की शरण में चले गए।

वे अपने भाई के अन्याय का साथ नहीं दे सकते थे।

आज उसी भाई का मृत शरीर उनके सामने था।

विभीषण अपने आँसू रोक नहीं पाए।

वे अपने भाई की ओर देखते रहे।

भैया! तुम इतने बड़े वीर थे। राजकाज की इतनी समझ रखते थे।

राजमहल के ऊँचे आसन और सुंदर शय्या तुम्हारे योग्य थे। आज धरती पर ऐसे कैसे पड़े हो?

उन्हें अपनी कही हुई सारी बातें याद आने लगीं।

उन्होंने रावण को समझाया था। औरों ने भी समझाया था। लेकिन रावण ने अहंकार और इच्छा के कारण अच्छी सलाह ठुकरा दी।

उसका परिणाम सामने था।

फिर भी विभीषण केवल उसकी गलतियाँ नहीं गिना रहे थे।

उन्हें अपने भाई की वीरता याद आ रही थी।

वे कभी उसकी तुलना आँधी में गिर पड़े विशाल वृक्ष से करते, कभी पराजित हुए बलवान हाथी से। कभी लगता जैसे धधकती हुई अग्नि बुझ गई हो।

विभीषण जानते थे कि उनके भाई ने अधर्म का रास्ता चुना था।

लेकिन वह उनका भाई भी तो था।

राम ने विभीषण की बात सुनी।

राम ने कहा कि रावण बिना लड़े नहीं गिरा। उसने युद्ध में पूरी वीरता दिखाई थी।

युद्ध का नियम ही ऐसा है। कभी एक योद्धा जीतता है, कभी दूसरा। कोई सदा विजयी नहीं रहता।

अब जो कर्तव्य बाकी है, उसके बारे में सोचना चाहिए।

विभीषण ने फिर अपने भाई की बात की।

रावण दान देता था। अपने सेवकों का भरण-पोषण करता था। मित्रों को धन देता था।

उसने तपस्या की थी। वेदों का अध्ययन किया था। पवित्र अग्नियों का पालन किया था।

इन गुणों के होते हुए भी उसने बड़े गलत निर्णय लिए थे।

विभीषण अपने भाई के अंतिम संस्कार करना चाहते थे। उन्होंने राम से इसकी अनुमति माँगी।

तब राम ने कहा:

मृत्यु के साथ वैर समाप्त हो जाता है। हमारा प्रयोजन पूरा हो गया। इसके अंतिम संस्कार करो।

यह जितना तुम्हारा है, उतना ही मेरा भी है।

मगर लंका के लोगों का दुख अभी शांत नहीं हुआ था।

रावण की पत्नी मंदोदरी उसके पास आईं। महल की दूसरी स्त्रियाँ भी रो रही थीं।

मंदोदरी को अपने पति की शक्ति और उसके पुराने गौरव की याद आ रही थी।

लेकिन उन्हें उसकी गलतियाँ भी याद थीं।

सीता का हरण करना कितना बड़ा अन्याय था! इसी कारण रावण अपने साथ कितने लोगों को विनाश की ओर ले गया था।

मंदोदरी ने भी उसे समझाया था। उसने उनकी बात भी नहीं सुनी थी।

अब वे उसी पति के लिए शोक कर रही थीं।

राम ने विभीषण से कहा कि वे अपने भाई के अंतिम संस्कार करें और शोक में डूबी स्त्रियों को सांत्वना दें।

मगर इस बार विभीषण रुक गए।

उन्होंने राम से कहा कि रावण ने धर्म छोड़ दिया था। वह क्रूर था। छल करता था।

दूसरों की स्त्रियों पर बुरी दृष्टि रखता था।

ऐसे व्यक्ति का सम्मान कैसे किया जा सकता है?

उन्हें लगा कि उनका भाई तो भाई के रूप में शत्रु बन चुका था।

विभीषण न अपने भाई के अपराध भूल सकते थे, न अपने मन का दुख।

राम ने उनकी बात सुनी।

उन्होंने रावण के अधर्म को नकारा नहीं। यह भी माना कि रावण ने गलत कर्म किए थे।

लेकिन राम ने उसके पराक्रम को भी याद किया।

फिर उन्होंने विभीषण को वही बात दोबारा समझाई—मृत्यु के साथ शत्रुता समाप्त होनी चाहिए।

जो अंतिम संस्कार रावण को मिलना चाहिए, वह उससे रोका नहीं जाना चाहिए।

विभीषण लंका गए।

उन्होंने पुरोहितों को बुलाया। चंदन की लकड़ियाँ मँगवाईं। सुगंधित लकड़ियाँ और अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक सामग्री इकट्ठी की गई।

रावण के शरीर को सजी हुई शिविका पर रखा गया।

आगे पवित्र अग्नियाँ ले जाई गईं। पीछे महल की स्त्रियाँ रोती हुई चल रही थीं।

विभीषण उस यात्रा में सबसे आगे थे।

उन्होंने अपने भाई के लिए विधिपूर्वक अंतिम संस्कार किए।

तिल और जल अर्पित किया। सिर झुकाकर प्रणाम किया।

फिर दुखी स्त्रियों को सांत्वना देकर वे राम के पास लौट आए।

युद्ध समाप्त हो गया था।

राम ने अपना धनुष, बाण और कवच उतारकर रख दिया।

वाल्मीकि रामायण बताती है कि राम ने अपना क्रोध भी त्याग दिया।

छोटी कहानी · 3 मिनट

युद्ध समाप्त हो चुका था।

रावण धरती पर पड़ा था। उसका मुकुट नीचे गिर गया था।

उसके छोटे भाई विभीषण उसे देखकर रो पड़े।

विभीषण ने रावण को कितनी बार समझाया था—सीता को लौटा दो, राम से युद्ध मत करो।

लेकिन रावण ने किसी की नहीं सुनी।

आखिर विभीषण लंका छोड़कर राम की शरण में चले गए थे।

आज उनका भाई युद्ध में मारा गया था।

विभीषण को उसकी वीरता याद आई। उसकी शक्ति याद आई। और वे सारी बातें भी याद आईं, जिन्हें रावण ने सुनने से इनकार कर दिया था।

राम ने उन्हें सांत्वना दी।

रावण ने बहादुरी से युद्ध किया था। अब जो कर्तव्य बाकी है, उसके बारे में सोचना चाहिए।

विभीषण ने अपने भाई के अंतिम संस्कार करने की अनुमति माँगी।

तब राम बोले:

मृत्यु के साथ वैर समाप्त हो जाता है। हमारा प्रयोजन पूरा हो गया है। इसके अंतिम संस्कार करो।

यह जितना तुम्हारा है, उतना ही मेरा भी है।

बाद में जब रावण की पत्नी मंदोदरी और दूसरी स्त्रियाँ शोक कर रही थीं, राम ने विभीषण को फिर अंतिम संस्कार करने के लिए कहा।

लेकिन अब विभीषण हिचकिचाए।

उसने धर्म का पालन नहीं किया। उसने छल और अत्याचार किए। मैं उसका सम्मान कैसे करूँ?

राम ने रावण के बुरे कर्मों से इनकार नहीं किया।

मगर युद्ध समाप्त हो चुका था। रावण अब जीवित नहीं था।

राम ने समझाया कि उसके अंतिम संस्कार अवश्य होने चाहिए।

विभीषण ने पुरोहितों को बुलाया। चंदन की लकड़ियाँ और पवित्र अग्नियाँ मँगवाईं।

रावण के अंतिम संस्कार किए गए।

विभीषण ने तिल और जल अर्पित किया, सिर झुकाया और फिर राम के पास लौट आए।

राम ने अपना धनुष, अपने बाण और अपना कवच उतार दिया।

युद्ध के साथ उन्होंने अपना क्रोध भी छोड़ दिया।

अब बच्चे की ओर मुड़िए

क्या कभी किसी की गलती पर बहुत गुस्सा आया, फिर भी उसके साथ अच्छा व्यवहार करने का मन हुआ? उस समय सबसे कठिन क्या लगा?

और अगर वह कंधे उचका दे, तो इतना कहकर छोड़ सकते हैं: किसी के साथ सम्मान से पेश आने का अर्थ यह नहीं कि उसकी गलती सही हो गई।

अगर बच्चा पूछे: “क्या राम ने रावण को माफ़ कर दिया था?”

इस प्रसंग में राम के औपचारिक रूप से क्षमा करने का वर्णन नहीं है। वे कहते हैं कि शत्रुता समाप्त हो गई है और रावण के अंतिम संस्कार किए जाने चाहिए।

अगर बच्चा पूछे: “विभीषण पहले अनुमति माँगकर बाद में क्यों हिचकिचाए?”

इन अध्यायों में दोनों बातें आती हैं। पहले वे अंतिम संस्कार की अनुमति माँगते हैं। स्त्रियों के शोक के बाद वे रावण के अपराध याद करके आपत्ति करते हैं; राम फिर अंतिम कर्तव्य करने को कहते हैं।

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