आकाश किसमें बुना है?
गार्गी ने पूछा कि सारा जगत किसमें बुना है। उत्तर मिला—आकाश में। लेकिन उनका दूसरा प्रश्न अभी बाकी था।
प्रकाशक Sandhya Katha · अद्यतन
इसे माता-पिता के पढ़कर सुनाने, हिन्दी भाषा-संपादन और मूल स्रोत से मिलान—तीनों के बाद मंज़ूर किया गया है। भाषा बदलने से कहानी की पहचान नहीं बदलती।
उपनिषद · 3.8.1–12
मूल स्रोत का मूल रूप
Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad — 3.8.1–12
परंपरा के बारे में. यह कथन मूल काण्व पाठ और म्यूलर के अनुवाद के अनुसार है। माध्यंदिन पाठ में इसी संवाद की शुरुआत में गार्गी कहती हैं कि उत्तर न देने पर याज्ञवल्क्य का सिर गिर जाएगा; काण्व पाठ में यह वाक्य नहीं है। दोनों पाठों में दो प्रश्न हैं। यह बृहदारण्यक उपनिषद् के तीसरे अध्याय के आठवें खण्ड वाला बाद का संवाद है। पहले, छठे खण्ड में, याज्ञवल्क्य गार्गी को सिर गिरने की कठोर चेतावनी देते हैं। दोनों संवादों को मिलाया नहीं गया है; उस चेतावनी को छिपाया भी नहीं गया है। कथा का आधार मूलर का अनुवाद है। काण्व और माध्यंदिन, दोनों पाठ-परम्पराएँ हैं; सभी पाठों का पूर्ण मिलान होने का दावा नहीं है।
शुरू करने से पहले. आयु ९ वर्ष से। बृहदारण्यक उपनिषद् ३.८ के बाद वाले संवाद का कथन। बाणों की बात प्रश्नों के लिए उपमा है। बड़ी कथा में मृत्यु का संक्षिप्त उल्लेख है; पहले संवाद की कठोर चेतावनी नीचे बड़ों के लिए दी गई है।

गार्गी के पास याज्ञवल्क्य से पूछने के लिए दो प्रश्न थे। उन्होंने वहाँ बैठे विद्वानों से कहा कि यदि वे इनका उत्तर दे दें, तो ब्रह्म के विषय में कोई उन्हें तर्क से नहीं हरा सकेगा।
पूछो, गार्गी, याज्ञवल्क्य ने कहा।
गार्गी ने अपने प्रश्नों की तुलना योद्धा के दो पैने बाणों से की। अब पहला प्रश्न आया।
स्वर्ग से ऊपर, धरती से नीचे और दोनों के बीच जो कुछ है; जो बीत गया, जो अभी है और जो आगे होगा—वह सब किसमें बुना है?
जैसे कपड़े में धागे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, वैसे ही गार्गी पूरे जगत के आधार के बारे में पूछ रही थीं।
आकाश में, याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया।
गार्गी ने उन्हें प्रणाम किया। पहला उत्तर मिल गया था। अब उन्होंने दूसरे प्रश्न के लिए तैयार रहने को कहा।
उन्होंने पहली बात फिर पूछी। याज्ञवल्क्य ने फिर कहा—आकाश में।
तो आकाश स्वयं किसमें बुना है?
उत्तर था—अक्षर, जो नष्ट नहीं होता।
याज्ञवल्क्य ने बताया कि वह न मोटा है, न महीन; न छोटा, न लम्बा। उसमें स्वाद या गन्ध नहीं, आँखें या कान नहीं। उसे नापा नहीं जा सकता; उसका न भीतर है, न बाहर।
उन्होंने कहा कि उसी के शासन में सूर्य और चन्द्रमा अपने स्थान पर हैं। दिन-रात, महीने और ऋतुएँ अपने क्रम में चलते हैं। नदियाँ अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं।
वह दिखाई नहीं देता, फिर भी देखने वाला है। सुनाई नहीं देता, फिर भी सुनने वाला है।
यह उस जानने वाले की बात थी, जिसे देखने की कोई वस्तु नहीं बनाया जा सकता। उसी अक्षर में आकाश बुना है।
गार्गी ने विद्वानों की ओर मुड़कर कहा कि ब्रह्म के विषय में कोई याज्ञवल्क्य को तर्क से नहीं हरा सकेगा। फिर वे चुप हो गईं।
पहले प्रश्न में पूरा जगत आया था। दूसरे में उस उत्तर का भी आधार पूछा गया था।
एक उत्तर सुनकर दूसरा प्रश्न मन में आए, तो तुम क्या करते हो?
और अगर वह कंधे उचका दे, तो इतना कहकर छोड़ सकते हैं: ध्यान से पूछा गया प्रश्न हमें पहले उत्तर से आगे ले जा सकता है।
अगर बच्चा पूछे: “गार्गी बाण लाई थीं?”
नहीं। उन्होंने अपने प्रश्नों की तुलना योद्धा के बाणों से की थी। यहाँ बात प्रश्न और उत्तर की है; इसलिए चित्र में हथियार नहीं हैं।
अगर बच्चा पूछे: “क्या वैज्ञानिकों ने अक्षर को खोज लिया है?”
यह ब्रह्म और ज्ञान के बारे में उपनिषद् का कथन है। आकाश को यहाँ जगह या विस्तार के अर्थ में समझाया गया है। इसे किसी भौतिक पदार्थ या वैज्ञानिक खोज का दावा नहीं बनाना चाहिए।
अगर बच्चा पूछे: “क्या वे पूछती रह सकती थीं?”
इस बाद वाले संवाद में याज्ञवल्क्य उन्हें बार-बार पूछने को कहते हैं। पहले, तीसरे अध्याय के छठे खण्ड में, वे कठोर चेतावनी देते हैं कि अधिक पूछने पर उनका सिर गिर सकता है। यह कथा आठवें खण्ड तक सीमित है; पहले प्रसंग को हम छिपाते नहीं। घर में बच्चा पूछ सकता है, असहमत हो सकता है और कह सकता है कि बात समझ नहीं आई। प्रश्न पूछने पर धमकी नहीं मिलनी चाहिए।
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