देवी ने दूत को अपना वचन सुनाया
शुम्भ और निशुम्भ ने देवताओं का राज्य छीन लिया था।
प्रकाशक Sandhya Katha · अद्यतन
इसे माता-पिता के पढ़कर सुनाने, हिन्दी भाषा-संपादन और मूल स्रोत से मिलान—तीनों के बाद मंज़ूर किया गया है। भाषा बदलने से कहानी की पहचान नहीं बदलती।
अन्य पुराण · 5.2–129; 6.2–13
मूल स्रोत का मूल रूप
Devī Māhātmya — 5.2–129; 6.2–13
परंपरा के बारे में. मूल देवीमाहात्म्य ५.८४–८८ में पार्वती से कौशिकी का उद्भव और शेष गहरे रूप को कालिका कहना है। अध्याय ७ में देवी के ललाट से काली का दूसरा वर्णन आता है; दोनों को एक ही घटना बताकर न मिलाएँ। दूत सुग्रीव रामायण के वानर सुग्रीव से अलग पात्र है—पहचान/लेक्सिकन में अलग कुंजी चाहिए। ५.१२३–१२६ में स्त्री होने पर उपहास और बाल खींचकर ले जाने की धमकी है; ६.१३ में धूम्रलोचन का वध है। यह वयस्क देवी की युद्ध-प्रतिज्ञा वाली पौराणिक कथा है, बच्चे को अकेले धमकी का सामना करने की सलाह नहीं। सिंह और सेना की आगे की हिंसा इस चुने हुए अंश से बाहर है।
शुरू करने से पहले. मूल देवीमाहात्म्य ५.८४–८८ में पार्वती से कौशिकी का उद्भव और शेष गहरे रूप को कालिका कहना है। अध्याय ७ में देवी के ललाट से काली का दूसरा वर्णन आता है; दोनों को एक ही घटना बताकर न मिलाएँ। दूत सुग्रीव रामायण के वानर सुग्रीव से अलग पात्र है—पहचान/लेक्सिकन में अलग कुंजी चाहिए। ५.१२३–१२६ में स्त्री होने पर उपहास और बाल खींचकर ले जाने की धमकी है; ६.१३ में धूम्रलोचन का वध है। यह वयस्क देवी की युद्ध-प्रतिज्ञा वाली पौराणिक कथा है, बच्चे को अकेले धमकी का सामना करने की सलाह नहीं। सिंह और सेना की आगे की हिंसा इस चुने हुए अंश से बाहर है।

शुम्भ और निशुम्भ ने देवताओं का राज्य छीन लिया था। संकट में देवताओं को देवी का पुराना वचन याद आया। संकट में उन्हें याद करने पर सहायता मिलने की बात वह पहले कह चुकी थीं। देवता हिमालय में उनकी स्तुति करते हुए यही आशा लेकर पहुँचे। वे हिमालय गए और उनकी स्तुति करने लगे। तभी पार्वती गंगा के पास आईं। उनके शरीर से एक उज्ज्वल रूप प्रकट हुआ। उसे कौशिकी कहा गया।
दो असुरों ने कौशिकी को देखा और शुम्भ को बताया। उसने अपना दूत भेजा। दूत ने देवी के सामने उसके वैभव की लंबी सूची रखी: तीनों लोकों की सत्ता और बहुत-सी अनमोल वस्तुएँ। उसने कहा कि देवी शुम्भ या उसके भाई निशुम्भ में से किसी को अपना पति चुन लें। उसने इन्द्र के हाथी, अद्भुत घोड़े और न मुरझाने वाली माला तक को राजा की वस्तुओं में गिनाया।
देवी ने दूत की बात सुनी। उन्होंने माना कि दोनों बहुत बलवान हैं। फिर अपना पुराना वचन बताया: जो उन्हें युद्ध में जीतेगा, उनका अभिमान दूर करेगा और उनकी शक्ति के बराबर ठहरेगा, उसी से वे विवाह करेंगी। दूत ने इस उत्तर का आदर नहीं किया। उसने अकेली स्त्री कहकर देवी का उपहास किया और बाल पकड़कर ले जाने की धमकी दी।
देवी ने अपना वचन नहीं बदला। उन्होंने दूत से कहा कि वह जाकर उनके शब्द वैसे ही सुनाए। दूत शुम्भ के पास लौटा। उसने उत्तर सुनकर धूम्रलोचन को सेना सहित भेजा कि देवी को बलपूर्वक लाए। धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ा। देवी की एक हुँकार से वह वहीं राख हो गया।
यह लड़ाई आगे भी चलती है, मगर दूत के आने से शुरू हुआ यह प्रसंग यहीं ठहरता है। दूत ने धन, बल और धमकी—तीनों का नाम लिया। देवी ने उसे वही उत्तर देकर लौटाया जो वह देना चाहती थीं। शुम्भ ने उस उत्तर के बाद बल भेजा; देवी ने पहले आक्रमण को रोक दिया।
दूत की बात निमंत्रण से धमकी कब बनी? देवी के उत्तर में क्या नहीं बदला?
और अगर वह कंधे उचका दे, तो इतना कहकर छोड़ सकते हैं: दूत का स्वर बदलता गया; देवी ने अपने शब्द अपने ही रखे।
अगर बच्चा पूछे: “देवी ने विवाह का वचन क्यों दिया?”
चुने हुए पाठ में वह कहती हैं कि पहले ऐसा वचन दे चुकी हैं। उस वचन से पहले का दृश्य यहाँ नहीं दिखाया गया; कोई नया कारण बनाकर नहीं जोड़ना चाहिए।
अगर बच्चा पूछे: “दूत ने धमकी क्यों दी?”
देवी ने उसके स्वामी की बात मानने से इनकार किया। दूत ने उत्तर सुनने के बजाय बल और अपमान की बात की। यह उसका व्यवहार था, देवी की गलती नहीं।
अगर बच्चा पूछे: “क्या युद्ध वहीं खत्म हो गया?”
नहीं। इस छोटे प्रसंग में धूम्रलोचन का पहला हमला रुकता है। देवीमाहात्म्य में आगे और युद्ध आते हैं, जिन्हें यहाँ नहीं सुनाया गया।
हर रात इन्हीं समीक्षित हिन्दी कहानियों में से उम्र और दिन के अनुसार एक कहानी चुनी जाती है।
आज रात की हिन्दी कहानी पढ़ें