जौ के सत्तू से शुरू हुआ सपना
खाट के ऊपर टँगे घड़े में जौ का सत्तू था। ब्राह्मण ने आँखें बंद कीं तो वही घड़ा बकरियों, घोड़ों और बड़े घर में बदल गया।
प्रकाशक Sandhya Katha · अद्यतन
इसे माता-पिता के पढ़कर सुनाने, हिन्दी भाषा-संपादन और मूल स्रोत से मिलान—तीनों के बाद मंज़ूर किया गया है। भाषा बदलने से कहानी की पहचान नहीं बदलती।
पञ्चतन्त्र
मूल स्रोत का मूल रूप
Pañcatantra, Pūrṇabhadra recension in Arthur W. Ryder's translation — Book V, The Brahman's Dream (embedded tale following Slow, the Weaver)
परंपरा के बारे में. यह पंचतंत्र के पूर्णभद्र पाठ में जौ के सत्तू का घड़ा है, जो खाट के ऊपर खूँटी से टँगा है। दूसरे रूपों में चावल या आटे और अलग जगह रखे बर्तन का उल्लेख मिलता है; वे यहाँ के स्रोत नहीं हैं।
शुरू करने से पहले. कथा में ब्राह्मण स्वप्न में अपनी होने वाली पत्नी को लात मारने की सोचते हैं। वास्तव में वहाँ कोई पत्नी नहीं है; पैर घड़े से टकराता है। स्त्री पर हिंसा को हास्य या समाधान बनाकर न सुनाएँ।

पंचतंत्र में दो यात्री अपनी उम्मीदों की बात कर रहे थे। एक ने दूसरे को गरीब ब्राह्मण स्वभावकृपण की कथा सुनाई। उन्हें भिक्षा में जौ का सत्तू मिला था। कुछ खाया, बचा हुआ एक घड़े में भर दिया। रात को घड़ा खूँटी पर टाँगा और ठीक नीचे खाट डालकर लेट गए।
घड़ा उनके सिर के ऊपर सुरक्षित लग रहा था। वह अगले दिन के भोजन का भरोसा था; उसी को देखते हुए वे आँखें मूँदकर हिसाब लगाने लगे।
लेटे-लेटे उन्होंने ऊपर देखा और सोचा—अकाल पड़ा तो यह सत्तू सौ रुपये में बिकेगा। उन रुपयों से दो बकरियाँ खरीदूँगा। अभी न अकाल था, न ग्राहक; फिर भी मन में रुपयों की थैली आ चुकी थी।
दो बकरियों से बड़ा झुंड होगा। झुंड बेचकर गायें आएँगी, फिर भैंसें, फिर घोड़ियाँ। घोड़ियों के बच्चे होंगे, घोड़े बिकेंगे और सोना आएगा। उनके मन में अपना बड़ा घर भी बन गया। घड़े से एक मुट्ठी सत्तू अभी तक निकला भी नहीं था।
सपने में उनका विवाह हुआ और बेटा पैदा हुआ। उन्होंने नाम भी सोच लिया। एक दिन वे अस्तबल के पास बैठकर पढ़ रहे होंगे। बच्चा घोड़ों की ओर भागेगा। ब्राह्मण पत्नी से उसे वापस लाने को कहेंगे, पर वह अपने काम में लगी होगी।
वे कल्पना में क्रोधित हुए और पत्नी को लात मारने के लिए पैर उठाया। उनका असली पैर भी चला। ऊपर लटका घड़ा टूट गया। जौ का सत्तू उन्हीं पर बरस पड़ा; सिर से पाँव तक वे सफेद हो गए।
उस कमरे में न बकरियाँ थीं, न घोड़े, न घर, न पत्नी-बेटा। घड़ा और उसका भोजन सच था। पैर चलते ही वही चला गया। कहानी सुनाने वाला यात्री अपने साथी को समझा रहा था कि हर सोची हुई सीढ़ी को पहले ही चढ़ी हुई न मान लो।
उन्होंने सत्तू से एक पूरा भविष्य बना लिया था। भविष्य आने से पहले उनका पैर उस घड़े तक पहुँच गया जिस पर पूरा सपना टिका था।
किस जगह ब्राह्मण की योजना ऐसी कल्पना बन गई जिसे वे हो चुका मान बैठे?
और अगर वह कंधे उचका दे, तो इतना कहकर छोड़ सकते हैं: योजना बनाते समय यह याद रखना ज़रूरी है कि क्या सचमुच हुआ है और क्या अभी केवल आशा है।
अगर बच्चा पूछे: “घड़े में चावल थे क्या?”
यहाँ चुने गए पूर्णभद्र पंचतंत्र पाठ में जौ का सत्तू था। ब्राह्मण ने कुछ खाया, शेष घड़े में रखा और उसे खाट के ऊपर टाँग दिया। दूसरे रूपों में भोजन बदल जाता है।
अगर बच्चा पूछे: “क्या उन्होंने सचमुच पत्नी को लात मारी?”
नहीं। पत्नी केवल उनकी कल्पना में थी। उन्होंने उसे लात मारने का विचार किया, लेकिन असली पैर ऊपर के घड़े से लगा। किसी को मारने का विचार भी अच्छा नहीं; कथा में किसी स्त्री को चोट नहीं लगती।
अगर बच्चा पूछे: “क्या बेहतर भविष्य की कल्पना करना गलत है?”
नहीं। पंचतंत्र सावधान करता है कि आशा की हर कड़ी को पहले से पक्का न मानें। ब्राह्मण अपना सत्तू रखकर भी भविष्य सोच सकते थे; बिना देखे पैर चलाने से वही भोजन खो गया।
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