रेत ढोने वाली गिलहरी
समुद्र पर पुल बन रहा था। वानर पहाड़ जैसे पत्थर ढो रहे थे। उस शोर के बीच, अपने रोओं में रेत भरकर दौड़ती एक छोटी-सी गिलहरी को कोई देख ही नहीं रहा था।
इसे माता-पिता के पढ़कर सुनाने, हिन्दी भाषा-संपादन और मूल स्रोत से मिलान—तीनों के बाद मंज़ूर किया गया है। भाषा बदलने से कहानी की पहचान नहीं बदलती।
Rāmāyaṇa — Yuddha Kāṇḍa — the building of the Setu
परंपरा के बारे में. सेतु-निर्माण का प्रसंग वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में है, लेकिन गिलहरी वाला प्रसंग उस संस्कृत पाठ में नहीं मिलता। यह कथा तमिल समेत कई क्षेत्रीय परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक कथाओं में सुनाई जाती है। यहाँ हम उसी क्षेत्रीय रूप को बता रहे हैं और उसका स्रोत अलग से साफ़ लिख रहे हैं।
शुरू करने से पहले. सेतु-निर्माण का प्रसंग वाल्मीकि रामायण में है, लेकिन गिलहरी वाला प्रसंग उस संस्कृत पाठ में नहीं मिलता। यह कथा तमिल समेत कई क्षेत्रीय परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक कथाओं में सुनाई जाती है।

सामने समुद्र था और उस पार लंका। राम की सेना को पार पहुँचना था, पर कोई पुल नहीं था। इसलिए वानर बड़े-बड़े शिलाखंड उठाकर समुद्र में डालते रहे। कई दिनों तक यही काम चलता रहा।
उस सारी भाग-दौड़ के बीच एक छोटी-सी गिलहरी भी लगी हुई थी। मगर किसी की नज़र उस पर नहीं गई।
वह इतनी छोटी थी कि एक कंकड़ भी नहीं उठा सकती थी। उसने अपना तरीका ढूँढ़ लिया। किनारे तक दौड़ती, गीली रेत में लोटती, फिर पुल पर लौटकर पत्थरों की दरारों में अपने रोओं से रेत झाड़ देती।
फिर वापस किनारे। फिर रेत। फिर पुल। पूरे दिन उसका यही चक्कर चलता रहा, जबकि ऊपर बड़े पत्थरों के गिरने की गूँज थमती ही नहीं थी।
एक वानर ने उसे देखा और हँस पड़ा। जैसे रास्ते से कोई पत्ता हटाते हैं, वैसे ही उसे धीरे से उठाकर एक ओर रख दिया। अभी रहने दो, नन्ही-सी। यह काम बड़े हाथों का है।
यह देखकर राम पलटे।
वे उसके पास घुटनों के बल बैठ गए और उसे अपनी हथेली पर चढ़ने दिया। फिर बाकी वानरों को सुनाते हुए बोले, पुल सिर्फ बड़े पत्थरों से नहीं बनता। यह जो रेत ला रही है, वही उन पत्थरों के बीच की खाली जगह भर रही है। इसके बिना यह बस पत्थरों का ढेर है। इसके साथ यही रास्ता बनता है।
फिर राम ने बहुत हल्के से उसकी पीठ पर तीन उँगलियाँ फेर दीं।
चार दिन बाद पूरी सेना उसी पुल से पार गई। पुल टिका रहा।
इसीलिए आज भी गिलहरी की पीठ पर तीन हल्की धारियाँ दिखाई देती हैं—राम की उँगलियों के निशान। वे निशान फिर कभी मिटे ही नहीं।
वानरों को लगा था कि उसकी मुट्ठी-भर रेत से क्या फर्क पड़ेगा। तुमने कभी ऐसा कोई छोटा-सा काम किया है जिसे करते हुए तुम्हें लगा हो—इससे भला क्या फर्क पड़ेगा?
और अगर वह कंधे उचका दे, तो इतना कहकर छोड़ सकते हैं: हर काम सिर्फ बड़े हाथों से नहीं होता।
अगर बच्चा पूछे: “क्या वाल्मीकि रामायण में गिलहरी आती है?”
सेतु-निर्माण का प्रसंग वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में है। उस संस्कृत पाठ में गिलहरी वाला प्रसंग नहीं है। गिलहरी की यह कथा तमिल समेत कई क्षेत्रीय और मौखिक परंपराओं में सुनाई जाती है। यहाँ हम उसी रूप को बता रहे हैं और उसका स्रोत अलग से साफ़ रखते हैं।
अगर बच्चा पूछे: “गिलहरी की पीठ पर तीन धारियाँ क्यों हैं?”
इस क्षेत्रीय कथा में राम गिलहरी को अपनी हथेली पर लेते हैं और उसकी पीठ पर तीन उँगलियाँ फेरते हैं। वही तीन निशान उसकी पीठ की धारियाँ माने जाते हैं।
अगर बच्चा पूछे: “इतनी-सी रेत से क्या सच में कोई फर्क पड़ता?”
इस कथा में गिलहरी रेत को पत्थरों के बीच की खाली जगहों में भरती है। बात यही है कि बड़े काम में कभी-कभी बहुत छोटा हिस्सा भी अपनी जगह पर जरूरी होता है।