यम कहते रहे लौट जाओ, सावित्री चलती रहीं
सावित्री को पहले से मालूम था कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष है। जिस दिन वे मरे, यम उनका प्राण लेकर चले; सावित्री पीछे नहीं छूटीं। हर कुछ दूर पर एक बातचीत, फिर एक वरदान, फिर कुछ और कदम।
इसे माता-पिता के पढ़कर सुनाने, हिन्दी भाषा-संपादन और मूल स्रोत से मिलान—तीनों के बाद मंज़ूर किया गया है। भाषा बदलने से कहानी की पहचान नहीं बदलती।
Mahābhārata — Vana Parva, Pativratā-māhātmya Parva, K.M. Ganguli CCLXLIII–CCLXLVI
परंपरा के बारे में. यह कथा महाभारत के वनपर्व में सावित्री–सत्यवान प्रसंग का हिस्सा है। नारद की भविष्यवाणी, सावित्री का जानते हुए विवाह, वन में सत्यवान की मृत्यु, यम के पीछे चलना, एक-एक करके मिले वर और अंत में सत्यवान का लौटना—ये सभी उसी क्रम में आते हैं।
शुरू करने से पहले. सत्यवान सावित्री की गोद में शांत रूप से मरते हैं और बाद में जीवित लौटते हैं। दृश्य हिंसक नहीं है, पर मृत्यु साफ़ शब्दों में आती है। कहानी का लंबा हिस्सा सावित्री और यम के बीच चलते हुए संवाद पर है।

सावित्री ने सत्यवान को अपना पति चुनने से पहले ही कठिन बात सुन ली थी। नारद ने कहा था—सत्यवान केवल एक वर्ष और जीवित रहेंगे। सबने सावित्री से दूसरा चुनाव करने को कहा। उन्होंने सत्यवान को ही चुना और तारीख याद रखी।
वह दिन आया तो सावित्री सत्यवान के साथ वन गईं। लकड़ी काटते-काटते उन्हें तेज़ कमजोरी महसूस हुई। उन्होंने सिर सावित्री की गोद में रखा और वहीं उनकी मृत्यु हो गई।
फिर यम सत्यवान का प्राण लेकर चल पड़े। सावित्री भी साथ चलने लगीं। उन्होंने रास्ता रोका नहीं, प्राण छीनने की कोशिश नहीं की। वे बस पीछे नहीं मुड़ीं।
यम ने कहा, तुमने पत्नी का कर्तव्य पूरा कर दिया। अब लौट जाओ. सावित्री ने धर्म, संगति और साथ-साथ चलने से बनने वाली मित्रता की बात की। वे चलती रहीं।
उनकी बातों से प्रसन्न होकर यम ने कहा—सत्यवान का जीवन छोड़कर कोई वर माँगो। सावित्री ने अपने अंधे ससुर की दृष्टि और शक्ति माँगी। वर मिला। अब लौट जाओ.
सावित्री फिर भी साथ चलीं। अगला वर—ससुर का खोया राज्य वापस मिले। फिर अपने पिता के लिए सौ पुत्र। हर बार वर मिला; हर बार यम ने लौटने को कहा; हर बार कुछ और कदम बाकी निकले।
आख़िर यम ने एक और वर दिया, फिर वही सीमा—सत्यवान का जीवन नहीं। सावित्री ने माँगा कि उन्हें और सत्यवान को सौ पुत्र हों। यम ने तथास्तु कहा।
अब उसी वर ने रास्ता बदल दिया। सत्यवान जीवित न हों तो सावित्री और सत्यवान के पुत्र कैसे होंगे? बातचीत उस जगह पहुँच चुकी थी जहाँ पहले दिए वर को निभाने के लिए सत्यवान का लौटना आवश्यक था।
यम ने सत्यवान का प्राण छोड़ दिया। सावित्री वन में लौटीं; सत्यवान जागे। पहले दिए वर भी पूरे होने वाले थे—दृष्टि, राज्य और वंश की प्रतिज्ञाएँ बनी रहीं।
सावित्री ने एक तेज़ चाल से यम को नहीं हराया। वे चलती रहीं, सुनती रहीं, बोलती रहीं—जब तक बातचीत ने असंभव लगने वाली जगह में एक रास्ता नहीं बना दिया।
जब कोई बार-बार कहे अब लौट जाओ, तब तुम कैसे तय करोगे कि रुकना है या थोड़ी दूर और चलना है?
और अगर वह कंधे उचका दे, तो इतना कहकर छोड़ सकते हैं: सावित्री का बल केवल अंतिम वाक्य में नहीं; पूरी बातचीत को जीवित रखने में है।
अगर बच्चा पूछे: “क्या सावित्री ने यम को चालाकी से फँसा दिया?”
कहानी एक छिपी हुई चाल पर नहीं टिकी। लंबे संवाद में यम खुद कई वर देते हैं। जब वे सावित्री और सत्यवान के पुत्रों का वर दे चुके होते हैं, तब उस वर का पूरा होना सत्यवान के जीवित होने से जुड़ जाता है।
अगर बच्चा पूछे: “यम ने उन्हें जाने क्यों नहीं दिया?”
वे कई बार उन्हें लौटने को कहते हैं। सावित्री फिर भी धर्म और संगति की बात करते हुए साथ चलती रहती हैं, और यम उनकी बातों का उत्तर देते रहते हैं। कथा का आकार ही यह लंबी चलती हुई बातचीत है।
अगर बच्चा पूछे: “सावित्री ने सत्यवान को जानते हुए क्यों चुना?”
नारद की भविष्यवाणी सुनने के बाद उन्हें दूसरा वर चुनने की सलाह दी गई थी। उन्होंने कहा कि चुनाव एक बार हो चुका है और सत्यवान को ही चुना। कथा इस निर्णय को बदलती नहीं; आगे की पूरी घटना उसी जानकारी के साथ चलती है।
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