बिना एक भी पत्थर के बना पूसलार का मंदिर
न पैसे, न पत्थर, न कारीगर। फिर भी पूसलार ने पूरा मंदिर बनाया—अपने मन में। उसके प्राण-प्रतिष्ठा के दिन के लिए एक राजा को अपने पत्थर के मंदिर का उत्सव टालना पड़ा।
इसे माता-पिता के पढ़कर सुनाने, हिन्दी भाषा-संपादन और मूल स्रोत से मिलान—तीनों के बाद मंज़ूर किया गया है। भाषा बदलने से कहानी की पहचान नहीं बदलती।
Periya Purāṇam — Pūsalār Nāyaṉār
परंपरा के बारे में. यह तमिल शैव परंपरा की कथा है। बारहवीं शताब्दी में सेक्किलार ने इसे पेरिय पुराणम् में पूसलार नायनार की कथा के रूप में लिखा। इसकी जाँच के लिए कोई अलग संस्कृत रूप नहीं है; यह वही तमिल परंपरा है जिसे हम यहाँ साफ़ नाम देकर सुना रहे हैं।
शुरू करने से पहले. कहानी पूसलार की गरीबी को छिपाती नहीं, लेकिन उन्हें दया का पात्र बनाकर भी नहीं सुनाती। केंद्र में वह सावधानी है जो उन्होंने उस काम में लगाई जिसे कोई दूसरा देख ही नहीं रहा था।

पूसलार एक मंदिर बनाना चाहते थे। पर उनके पास न धन था, न जमीन खरीदने की ताक़त, न पत्थर ढुलवाने की व्यवस्था।
उन्होंने इच्छा नहीं छोड़ी। बस मंदिर बनाने की जगह बदल दी। मंदिर बनेगा, उन्होंने ठाना, मेरे मन में।
सबसे पहले उन्होंने जगह चुनी। बरसात में पानी न ठहरे, दिशा ठीक हो। फिर नींव खोदी। कोई देख नहीं रहा था, फिर भी उन्होंने वह हिस्सा नहीं छोड़ा जो बाद में दिखाई भी नहीं देता।
फिर पत्थर चढ़े, दीवारें उठीं, खंभे बने, गर्भगृह बना, द्वार बने और ऊपर का शिखर आकार लेने लगा। सब कुछ मन के भीतर, पर काम पूरा वैसा ही जैसे सचमुच निर्माण चल रहा हो।
यह एक दोपहर की कल्पना नहीं थी। सालों तक पूसलार उसी मंदिर पर काम करते रहे। बाहर गाँव वैसा ही रहा; भीतर मंदिर रोज़ थोड़ा और पूरा होता गया।
आख़िर एक दिन कुछ भी बाकी नहीं रहा। तब उन्होंने प्राण-प्रतिष्ठा के लिए दिन तय किया—वह दिन जब भगवान को नए मंदिर में आमंत्रित किया जाएगा।
उधर कांचीपुरम में पल्लव राजा राजसिंह भी एक विशाल पत्थर का मंदिर पूरा करा चुका था। सैकड़ों लोगों ने बरसों काम किया था। राजा ने भी प्राण-प्रतिष्ठा का दिन तय किया।
दोनों ने एक ही दिन चुना था।
उससे पिछली रात राजा के सपने में भगवान शिव आए। उन्होंने कहा, कल मैं तुम्हारे मंदिर नहीं आ सकूँगा। मुझे तिरुनिन्रवूर में पूसलार के मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा में जाना है। उन्होंने अपना दिन पहले तय किया था।
सुबह राजा हैरान था। उसके ही राज्य में इतना बड़ा मंदिर बन गया और उसे खबर तक नहीं? वह तुरंत तिरुनिन्रवूर पहुँचा।
वहाँ घर थे, गलियाँ थीं, लोग थे। नया मंदिर कहीं नहीं था। राजा ने पूसलार को बुलाया और पूछा, आपका मंदिर कहाँ है?
पूसलार ने बताया कि उन्होंने जगह कैसे चुनी, नींव कैसे रखी, दीवारें कैसे उठाईं और आज प्राण-प्रतिष्ठा कैसे होने वाली है। राजा सुनता रहा।
राजा वापस लौटा और अपने मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा किसी और दिन कर दी। पत्थर का उसका मंदिर इंतज़ार कर सकता था; जिस मंदिर को आँखें नहीं देख सकती थीं, उसका दिन पहले से लिया जा चुका था।
तुमने अपने मन में ऐसी कौन-सी चीज़ बनाई या रची है जिसे किसी और ने कभी नहीं देखा?
और अगर वह कंधे उचका दे, तो इतना कहकर छोड़ सकते हैं: कोई देख न रहा हो, तब भी लगाया गया ध्यान बेकार नहीं जाता।
अगर बच्चा पूछे: “तो क्या वह मंदिर सचमुच था?”
पत्थर का ऐसा मंदिर नहीं था जिसे हाथ से छुआ जा सके। पर कहानी में पूसलार बस कल्पना करके आगे नहीं बढ़ जाते; वे निर्माण का हर चरण पूरा करते हैं। राजा खुद उसे खोजने आता है और फिर अपनी प्राण-प्रतिष्ठा की तारीख बदल देता है। कहानी उसी मेहनत और ध्यान को वास्तविक महत्व देती है।
अगर बच्चा पूछे: “राजा ने अपना उत्सव क्यों टाला?”
भगवान शिव ने सपने में कहा कि वे पूसलार के मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा में जाएंगे, क्योंकि उसका दिन पहले तय किया गया था। राजा तिरुनिन्रवूर जाकर बात समझता है और फिर अपने मंदिर का दिन बदल देता है।
अगर बच्चा पूछे: “भगवान शिव ने पूसलार का मंदिर पहले क्यों चुना?”
कथा इसे गरीबी का इनाम नहीं बताती। पूसलार ने प्राण-प्रतिष्ठा का दिन पहले तय किया था, और भगवान शिव राजा से कहते हैं कि उस दिन उन्हें वहीं जाना है। इससे आगे कोई कारण पाठ नहीं देता।
हर रात इन्हीं समीक्षित हिन्दी कहानियों में से उम्र और दिन के अनुसार एक कहानी चुनी जाती है।
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