Sandhya Kathaसंध्या कथा

मैया की रस्सी हर बार छोटी क्यों पड़ी?

रस्सी पर रस्सी जुड़ती गई। फिर भी कान्हा को बाँधने के लिए दो अंगुल की कमी रह गई।

प्रकाशक Sandhya Katha · अद्यतन

समीक्षित हिन्दी संस्करण

इसे माता-पिता के पढ़कर सुनाने, हिन्दी भाषा-संपादन और मूल स्रोत से मिलान—तीनों के बाद मंज़ूर किया गया है। भाषा बदलने से कहानी की पहचान नहीं बदलती।

भागवत · 10.9.1–18

मूल स्रोत का मूल रूप

Bhāgavata Purāṇa — 10.9.1–18

परंपरा के बारे में. भागवत के दशम स्कन्ध, नौवें अध्याय का प्रसंग है। यहाँ कथा कृष्ण के बँध जाने पर रुकती है; दो वृक्षों के उद्धार का प्रसंग अगले अध्याय में है।

शुरू करने से पहले. मैया पहले छड़ी लेकर दौड़ती हैं, फिर बच्चे का डर देखकर उसे छोड़ देती हैं। ऊखल से बाँधने के प्रसंग को बच्चों के साथ अपनाने योग्य उपाय की तरह न सुनाएँ।

3 मिनटउम्र 6+माता-पिता से टकरावमूल कहानी v1
मैया की रस्सी हर बार छोटी क्यों पड़ी?
समीक्षित चित्र · मूल कहानी v1

यशोदा दही मथ रही थीं। घर के दूसरे कामों में सब व्यस्त थे, इसलिए आज मथानी उन्हीं के हाथ में थी। काम करते-करते अपने लाला की लीलाएँ गा रही थीं।

तभी कृष्ण आए और मथानी पकड़ ली। उन्हें दूध पीना था। मैया ने काम रोककर गोद में उठा लिया और दूध पिलाने लगीं।

उधर चूल्हे पर रखा दूध उफन पड़ा। लाला का पेट अभी भरा नहीं था, पर मैया उन्हें नीचे उतारकर दूध सँभालने दौड़ीं।

कृष्ण रूठ गए। एक पत्थर उठाकर दही की मटकी फोड़ दी और दूसरी ओर जाकर मक्खन खाने लगे।

मैया लौटीं तो मटकी टूटी मिली और लाला गायब। किसकी करतूत है, समझते देर न लगी। वे मुसकराईं और उन्हें ढूँढ़ने चलीं।

देखा तो उलटे ऊखल पर चढ़े हैं। ऊपर लटके बर्तन से मक्खन निकालते हैं, बंदरों को भी देते हैं और बीच-बीच में इधर-उधर देखते हैं।

मैया छड़ी लेकर पीछे से आईं। उन्हें देखते ही कृष्ण नीचे उतरे और भागे। मैया पीछे दौड़ीं; बालों में लगे फूल झरते गए।

आखिर उन्होंने लाला का हाथ पकड़ लिया। वे रोते हुए आँखें मल रहे थे, काजल फैल गया था। उनका डर देखकर मैया ने छड़ी छोड़ दी।

अब ऊखल से बाँधने को रस्सी ली। दोनों सिरे मिलाने लगीं तो दो अंगुल छोटी! एक और रस्सी जोड़ी, फिर भी उतनी ही कमी।

जितनी रस्सी जोड़तीं, दो अंगुल का फासला रह जाता। पास खड़ी गोपियाँ हँस रही थीं। मैया भी चकित थीं—इतनी रस्सी से इतना-सा बच्चा नहीं बँध रहा!

मेहनत से मैया पसीने-पसीने हो गईं। बाल भी खुल गए। कृष्ण ने उनकी थकान देखी तो उन्हें मैया पर दया आई; उन्होंने बँधना स्वीकार कर लिया।

अब सिरे मिल गए। जिस गाँठ के लिए मैया इतनी देर से लगी थीं, वह आखिर बँध गई।

अब बच्चे की ओर मुड़िए

मैया की थकान देखकर कृष्ण ने क्या किया?

और अगर वह कंधे उचका दे, तो इतना कहकर छोड़ सकते हैं: मैया बाँध सकीं, जब कान्हा ने बँधना स्वीकार किया।

अगर बच्चा पूछे: “दो अंगुल का क्या अर्थ है?”

मूल प्रसंग में रस्सी हर बार दो अंगुल छोटी पड़ती है। इसके अलग-अलग भक्तिपरक अर्थ भी बताए जाते हैं; वे व्याख्याएँ हैं, मैया का कहा हुआ संवाद नहीं।

यह वही स्रोत-जाँची कहानी है, अब समीक्षित हिन्दी में।

हर रात इन्हीं समीक्षित हिन्दी कहानियों में से उम्र और दिन के अनुसार एक कहानी चुनी जाती है।

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